चुनाव से पहले ही क्यों मिलती है पेंशन? वेंगुकोपल बोले- मेरी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया

वेंगुकोपल का सफ़ाई पक्ष: क्या पेंशन में देरी चुनावी चाल है?- कांग्रेस नेता और सांसद के.सी. वेंगुकोपल ने केरल सरकार की पेंशन व्यवस्था पर उठाए गए सवालों पर सफ़ाई दी है। उनका कहना है कि उनकी बात को गलत तरीके से पेश किया गया।
चुनाव से पहले पेंशन का बँटवारा: क्या यह राजनीति है?- वेंगुकोपल ने सवाल उठाया है कि आखिर चुनावों से ठीक पहले पेंशन का भुगतान क्यों किया जाता है? उन्होंने बताया कि पिछले साल सात महीनों की बकाया पेंशन में से दो महीने की रकम लोकसभा चुनाव से पहले दी गई, और इस साल उपचुनाव से पहले एक महीने की बकाया राशि। यह साफ़ दिखाता है कि सरकार पेंशन भुगतान को चुनावी फायदे से जोड़ रही है। क्या यह जनता के साथ अन्याय नहीं है?
सरकार के पास प्रचार के लिए तो पैसे हैं, लेकिन पेंशन के लिए नहीं?- वेंगुकोपल का आरोप है कि केरल सरकार के पास मुख्यमंत्री और सरकार के प्रचार के लिए तो पैसे की कमी नहीं है, लेकिन पेंशन या आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय की बात आते ही पैसे की कमी दिखाई देने लगती है। उनका कहना है कि उन्होंने यह मुद्दा उठाकर सरकार की असली प्राथमिकता दिखाने की कोशिश की थी, न कि पेंशन पाने वालों पर उंगली उठाने की।
वामपंथी दलों का पलटवार: आरोपों का खंडन- सीपीआई(एम) ने वेंगुकोपल के बयान को निराधार बताया है और कहा है कि यह जनता को गुमराह करने की कोशिश है। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार 2016 से 62 लाख लोगों को 1600 रुपये पेंशन दे रही है।
1600 रुपये की पेंशन का सच क्या है?- वेंगुकोपल ने सीपीआई(एम) के दावे को खारिज करते हुए कहा कि यह 1600 रुपये की पेंशन अलग-अलग योजनाओं को मिलाकर दिखाई जा रही है, इसे ‘पेंशन संशोधन’ का नाम दिया जा रहा है। उनका कहना है कि कई वेलफेयर बोर्डों को भी भारी बकाया राशि मिलनी बाकी है।
वेंगुकोपल का दोहराव: देरी पर ज़ोर- वेंगुकोपल ने फिर से साफ़ किया कि उनका इरादा पेंशन पाने वालों पर सवाल उठाना नहीं था। उनका कहना है कि पेंशन पाने वाले हकदार हैं और उन्हें समय पर पैसे मिलने चाहिए। उनका असली मकसद सरकार द्वारा पेंशन भुगतान में की जा रही देरी और चुनाव से पहले बकाया राशि देने की प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिलाना था।
विवाद बढ़ा, माफी की मांग- वेंगुकोपल के बयान के बाद वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री ने उनकी कड़ी आलोचना की और माफ़ी माँगने को कहा। यह विवाद नीलांबूर के उपचुनाव प्रचार के दौरान और भी ज़्यादा बढ़ गया है।



