मुंबई मेयर की कुर्सी पर सियासी हलचल तेज, होटल पॉलिटिक्स से लेकर ‘देव’ बयान तक गरमाई राजनीति

मुंबई बीएमसी चुनाव के बाद होटल शिफ्ट की सियासी अटकलें: क्या चल रहा है पर्दे के पीछे?-मुंबई महानगरपालिका चुनाव में महायुति को मामूली बहुमत मिलने के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में एक नई हलचल शुरू हो गई है। खासकर जब खबर आई कि एकनाथ शिंदे गुट के नवनिर्वाचित पार्षदों को एक होटल में रखा गया है, तब से अटकलों का बाजार गर्म है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि इस पूरे मामले में क्या-क्या बातें सामने आ रही हैं और क्यों यह सियासी खेल इतना अहम बन गया है।
संजय राउत का बड़ा दावा: पर्दे के पीछे चल रही है राजनीति-शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने हाल ही में संकेत दिए कि मुंबई में बीजेपी का मेयर बनने की योजना को लेकर कई पार्षद और खुद एकनाथ शिंदे भी इच्छुक नहीं हैं। उन्होंने कहा कि होटल में पार्षदों के रहने के बावजूद बातचीत और संदेश भेजने के कई रास्ते खुले रहते हैं, जो इस राजनीतिक खेल की जटिलता को दर्शाता है।
29 पार्षदों का होटल में रहना: क्या है वजह?-शिवसेना ने अपने 29 नए पार्षदों को मुंबई के एक होटल में रखा है। पार्टी का कहना है कि यह कदम एक ओरिएंटेशन वर्कशॉप के लिए उठाया गया है ताकि नए पार्षद बीएमसी के कामकाज को बेहतर समझ सकें। यह फैसला चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद लिया गया था, लेकिन इसे लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
महायुति की रणनीति में शिवसेना की अहम भूमिका-बीएमसी चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी है, लेकिन मेयर पद के लिए शिवसेना के समर्थन के बिना बहुमत पाना मुश्किल है। इसलिए शिंदे गुट की भूमिका रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हो गई है, जिस पर सभी राजनीतिक दलों की नजरें टिकी हुई हैं।
उद्धव ठाकरे के बयान से बढ़ी सियासी हलचल-मेयर पद की दौड़ के बीच उद्धव ठाकरे ने कहा कि अगर “देव” चाहे तो शिवसेना (UBT) का भी मेयर बन सकता है। उन्होंने शिंदे गुट की बीजेपी की ओर से तोड़फोड़ की आशंकाओं का भी इशारा किया, जिससे राजनीतिक माहौल और गर्मा गया है।
फडणवीस का जवाब: ‘देव’ से मतलब किससे?-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उद्धव ठाकरे के बयान पर तंज कसते हुए पूछा कि ‘देव’ से उनका मतलब ऊपर वाले भगवान से है या उनसे। उन्होंने कहा कि उन्हें भी ‘देवा’ कहा जाता है और ऊपर वाले ने तय कर दिया है कि महायुति का ही मेयर होगा, जो राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा है।
मामूली बहुमत और बढ़ती चिंता-227 सदस्यीय बीएमसी में महायुति के पास 118 सीटें हैं, जो बहुमत के लिहाज से ज्यादा बड़ा अंतर नहीं है। इस मामूली बहुमत की वजह से गठबंधन संभावित टूट-फूट को लेकर सतर्क है, और यही वजह है कि होटल पॉलिटिक्स और कड़ी सुरक्षा की खबरें सामने आ रही हैं।
विपक्ष की स्थिति और उसकी चुनौती-उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को 65 सीटें मिली हैं, एमएनएस को 6, कांग्रेस-वीबीए गठबंधन को 24, एआईएमआईएम को 8, एनसीपी को 3, सपा को 2 और एनसीपी (SP) को 1 सीट मिली है। अगर विपक्ष एकजुट हो जाए तो उनकी संख्या 106 तक पहुंच जाती है, जो बहुमत से सिर्फ आठ सीट कम है।
विपक्ष की एकजुटता और शिंदे गुट की सतर्कता-शिंदे गुट अपने 29 पार्षदों को एकजुट रखने में कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। हर कदम सोच-समझकर उठाया जा रहा है ताकि किसी भी तरह की टूट-फूट से बचा जा सके। यही वजह है कि होटल में पार्षदों को रखा गया है और सुरक्षा कड़ी की गई है।
‘घर वापसी’ की संभावना पर संजय राउत का बयान-जब संजय राउत से पूछा गया कि क्या पार्षदों की ‘घर वापसी’ हो सकती है, तो उन्होंने कहा कि कई नए पार्षद मूल शिवसैनिक हैं और ज्यादातर लोग नहीं चाहते कि बीजेपी का मेयर बने। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच भी बातचीत हुई है।
शिवसेना का पलटवार: होटल पॉलिटिक्स की अटकलें बेबुनियाद-शिवसेना नेता शीतल म्हात्रे ने होटल पॉलिटिक्स की खबरों को पूरी तरह खारिज किया। उन्होंने कहा कि 29 में से 20 पार्षद पहली बार चुने गए हैं, जिन्हें बीएमसी के कामकाज की जानकारी देना जरूरी है। उनका कहना था कि यह कदम पदों की सौदेबाजी नहीं बल्कि प्रशिक्षण के लिए है।
सौदेबाजी के आरोपों का खंडन-शीतल म्हात्रे ने साफ किया कि पार्षदों को होटल में रखने का मकसद पदों की सौदेबाजी नहीं है। उन्होंने कहा कि ये वही पार्षद हैं जिन्होंने शिवसेना (UBT) के उम्मीदवारों को हराया है, इसलिए डर या असुरक्षा की बात करना गलत है।
नारायण राणे का तीखा हमला-वरिष्ठ बीजेपी नेता नारायण राणे ने उद्धव ठाकरे और संजय राउत के बयानों को ‘ख्वाबों की दुनिया’ बताया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि क्या अब उद्धव ठाकरे भगवान भरोसे राजनीति करने लगे हैं। उन्होंने चुनाव के आंकड़ों को देखते हुए कहा कि इतना बड़ा अंतर पाटना मुश्किल है। मुंबई बीएमसी चुनाव के बाद से होटल में पार्षदों के ठहरने को लेकर जो सियासी अटकलें लग रही हैं, वे इस चुनाव की जटिलताओं को दर्शाती हैं। मामूली बहुमत, विपक्ष की एकजुटता की चुनौती और शिंदे गुट की रणनीति ने इस चुनाव को बेहद संवेदनशील बना दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि ये राजनीतिक खेल किस दिशा में जाता है और मुंबई की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ता है।



