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बीएमसी में सत्ता बदली, लेकिन शिवसेना (UBT) के चार पूर्व मेयर फिर जीते: मुंबई की राजनीति में नए मोड़ के संकेत

बीएमसी का नया चेहरा: सत्ता बदली, लेकिन शिवसेना का अनुभव बरकरार-करीब 25 साल तक ठाकरे परिवार के दबदबे में रहने के बाद इस बार बीएमसी का समीकरण बदल गया है। मेयर की कुर्सी अब बीजेपी और एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना के पास चली गई है। बावजूद इसके, शिवसेना (UBT) के चार पूर्व मेयर फिर से चुनाव जीतकर निगम में लौट आए हैं। इससे साफ है कि सत्ता भले बदली हो, लेकिन बीएमसी की राजनीति आने वाले समय में उतार-चढ़ाव से भरी और दिलचस्प बनी रहेगी।

चार पूर्व मेयर फिर निगम में सक्रिय-इस बार किशोरी पेडणेकर, विशाखा राउत, श्रद्धा जाधव और मिलिंद वैद्य ने जीत हासिल की है। ये सभी पहले अविभाजित शिवसेना के मेयर रह चुके हैं। इनके अलावा पूर्व डिप्टी मेयर हेमांगी वरलीकर, सुहास वडकर और बांद्रा वेस्ट से अलका केरकर भी निगम में पहुंचे हैं। इतने अनुभवी नेताओं की मौजूदगी से बीएमसी का कामकाज और भी सक्रिय और प्रभावशाली होगा।

कोविड काल की मेयर किशोरी पेडणेकर की अलग पहचान-किशोरी पेडणेकर नवंबर 2019 से मार्च 2022 तक मेयर रहीं, जब मुंबई कोरोना महामारी के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था। नर्स रह चुकी पेडणेकर को एक सख्त और जमीनी कार्यकर्ता माना जाता है। कोविड के दौरान वे गलियों, लोकल ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों का निरीक्षण करती नजर आईं, जिससे उनकी छवि एक सक्रिय और मेहनती नेता की बनी।

पुराने मेयरों का अनुभव बीएमसी के लिए बड़ा खजाना-पेडणेकर, मिलिंद वैद्य, श्रद्धा जाधव और विशाखा राउत सभी अविभाजित शिवसेना के दौर के मेयर रहे हैं। इनके पास नगर प्रशासन और मुंबई जैसे बड़े महानगर को संभालने का लंबा अनुभव है। भले ही मेयर की कुर्सी अब उनके पास न हो, लेकिन निगम में उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण और असरदार बनी रहेगी।

राजनीतिक परिवारों की मौजूदगी जारी-इस चुनाव में पूर्व मेयर चंद्रकांत हांडोरे की बेटी प्रज्योति हांडोरे हार गईं, लेकिन शिवसेना (UBT) विधायक और पूर्व मेयर सुनील प्रभु के बेटे अंकित प्रभु ने जीत हासिल की। साथ ही पूर्व मेयर विश्वनाथ महाडेश्वर की पत्नी पूजा महाडेश्वर भी निगम में पहुंची हैं। यह दिखाता है कि बीएमसी में राजनीतिक परिवारों की पकड़ अभी भी मजबूत है।

डिप्टी मेयर और बीजेपी की भी एंट्री-पूर्व डिप्टी मेयर सुहास वडकर और हेमांगी वरलीकर शिवसेना (UBT) से जीतकर आए हैं, जबकि अलका केरकर बीजेपी से चुनी गई हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि निगम में विपक्ष और सत्ता दोनों तरफ अनुभव की भरमार रहेगी। आने वाले दिनों में बीएमसी की बैठकों और फैसलों पर पूरे महाराष्ट्र की नजरें टिकी रहेंगी।

शिवसेना के मेयरों का राजनीतिक सफर-शिवसेना ने बीएमसी को सिर्फ नगर निकाय नहीं, बल्कि बड़े नेताओं की राजनीति की सीढ़ी बनाया है। डॉ. मनोहर जोशी मेयर बनने के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और लोकसभा अध्यक्ष बने। छगन भुजबल डिप्टी मेयर से उपमुख्यमंत्री बने। यह इतिहास बताता है कि बीएमसी की राजनीति महाराष्ट्र की सियासत में अहम भूमिका निभाती है। बीएमसी में सत्ता भले बदली हो, लेकिन शिवसेना के अनुभवी नेताओं की मौजूदगी से निगम की राजनीति में संतुलन और सक्रियता बनी रहेगी। आने वाले महीनों में बीएमसी की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिलेंगे, जो महाराष्ट्र की राजनीति को भी प्रभावित करेंगे।

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