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रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया: महंगे तेल और वैश्विक तनाव ने बढ़ाई चिंता

रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर: महंगे तेल और वैश्विक तनाव ने बढ़ाई आर्थिक चिंता-भारतीय रुपया सोमवार को डॉलर के मुकाबले गिरकर अब तक के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गया है। महंगे कच्चे तेल की कीमतें और मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव इस गिरावट की बड़ी वजह हैं। इस गिरावट का असर न सिर्फ बाजार पर बल्कि आम जनता और देश की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है।

रुपया गिरने के पीछे की वजहें-सोमवार को रुपया 39 पैसे गिरकर 95.23 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने वैश्विक बाजार को अस्थिर कर दिया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे तेल आयातक देशों पर भारी पड़ रही हैं। इसके अलावा, विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना भी रुपया कमजोर करने का बड़ा कारण है।

बाजार की स्थिति और निवेशकों की चिंता-इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 94.95 पर खुला, लेकिन दिनभर गिरता रहा और 95.23 पर बंद हुआ। गुरुवार को यह 94.84 पर बंद हुआ था। विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर की मजबूती और महंगे तेल की वजह से रुपये पर दबाव बना रहेगा। HDFC सिक्योरिटीज के दिलीप परमार के अनुसार, डॉलर-रुपया का स्तर 95.35 से 95.70 तक जा सकता है।

महंगे तेल का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर-ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 110 डॉलर प्रति बैरल बनी हुई है, जो भारत के लिए चिंता का विषय है। महंगा तेल महंगाई बढ़ाता है और देश के व्यापार घाटे को बढ़ाता है। तेल की बढ़ती कीमतें परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों को भी प्रभावित करती हैं, जिससे आम लोगों की जेब पर असर पड़ता है और आर्थिक विकास धीमा हो सकता है।

शेयर बाजार में मिला-जुला रुख-रुपये की गिरावट के बावजूद शेयर बाजार ने थोड़ी मजबूती दिखाई। सेंसेक्स 355.90 अंकों की बढ़त के साथ 77,269.40 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 121.75 अंक चढ़कर 24,119.30 पर पहुंच गया। हालांकि, विदेशी निवेशकों ने गुरुवार को 8,047.86 करोड़ रुपये के शेयर बेचे, जो बाजार के लिए चिंता का संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक हालात ही आगे बाजार की दिशा तय करेंगे।

आगे का रुख कैसा रहेगा?-विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में आर्थिक दबाव बना रह सकता है। सरकार ने पूंजीगत खर्च को बनाए रखने पर जोर दिया है ताकि विकास की गति धीमी न पड़े। लेकिन जब तक वैश्विक तनाव और तेल की कीमतें नियंत्रण में नहीं आतीं, रुपये पर दबाव बना रहेगा और आर्थिक चुनौतियां बनी रहेंगी।

 

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